मैगज़ीन ने अपने लेख में बीसवीं शताब्दी के शुरुआती दौर के हिस्पानवी दार्शनिक ख़ोसिए ओर्टेगा ई गासीट के एक कथन का हवाला दिया है कि इंसान का अस्ली ख़ज़ाना उसकी ग़लतियां होती हैं जो हज़ारों साल में जमा होती हैं।
मैगज़ीन के इस लेख के लेखक राबर्ट डी काबलान ने लिखा कि हमें यह समझ लेना चाहिए कि हमेशा हालात बहुत ख़राब दिशा में जा सकते हैं। लेखक का कहना है कि कमरे में बैठकर समीक्षा और विशलेषण करने का कोई फ़ायदा नहीं है, असली हालात तो मैदान में और ज़मीन पर होते हैं। अमरीकी इराक़ में पूरी तरह नाकाम रहे क्योंकि अमरीका में बड़े फ़ैसले करने वाली संस्थाओं को उन तथ्यों के बारे में कुछ पता ही नहीं जो मैदान में रह कर काम करने वाले पत्रकार और टीकाकार जानते हैं।
लेखक का कहना है कि इराक़ युद्ध का फ़ैसला तो कई महीने पहले कर लिया गया था लेकिन जब 11 सितम्बर की घटना हो गई तो कुछ हफ़्तों के भीतर इंतेक़ाम के लिए पूरे देश में माहौल बन गया। मगर नेता उस समय यह नहीं समझ पाए कि जो भावना और सोच इस समय बनी है वह ज़्यादा समय तक नहीं चल सकेगी बाद में लोग अलग पैमाने पर अपने विचार निर्धारित करेंगे।
इराक़ युद्ध का समर्थन करने वाले उस समय महाविनाश के हथियारों की बात करते थे, उनका तर्क होता था कि इराक़ युद्ध से मध्यपूर्व के इलाक़े में लोकतंत्र और आज़ादी को बढ़ावा मिलेगा मगर आज जब इतना समय बीत चुका है तो यह सारे तर्क हास्यास्पद लगने लगे हैं।
स्रोतः नेशनल इंट्रेस्ट, अलजज़ीरा डाट नेट